
सै.हैदर उस्मान
बरेली / भोजीपुरा की राजनीति इन दिनों तेज़ी से करवट ले रही है। क्षेत्र में सुल्तान की बढ़ती राजनीतिक सक्रियता अब केवल चर्चाओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसका सीधा असर शहजिल के सियासी गढ़ पर पड़ता दिखाई दे रहा है। जिन इलाकों को कभी शहजिल की मज़बूत पकड़ माना जाता था, वहां अब सुल्तान की मौजूदगी नए राजनीतिक समीकरण गढ़ रही है।सुल्तान द्वारा गांव-गांव जनसंपर्क, आम लोगों की छोटी-बड़ी समस्याओं को उठाना और प्रशासनिक अधिकारियों तक शिकायतें पहुंचाने की रणनीति ने उन्हें जनता के बीच तेजी से लोकप्रिय बनाया है। बीते कुछ महीनों में उन्होंने सड़क की बदहाली, जलभराव, बिजली कटौती, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और युवाओं की बेरोजगारी जैसे अहम मुद्दों को प्रमुखता से उठाया है।खास बात यह है कि सुल्तान केवल बयानबाज़ी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि खुद मौके पर पहुंचकर लोगों की समस्याएं सुनते और उनके समाधान के लिए दबाव बनाते नज़र आ रहे हैं। यही वजह है कि जिन इलाकों में पहले शहजिल का दबदबा माना जाता था, वहां अब सुल्तान के समर्थकों की संख्या बढ़ती दिखाई दे रही है।राजनीतिक जानकारों का कहना है कि सुल्तान की इस बढ़ती पकड़ ने शहजिल की रणनीति को झकझोर कर रख दिया है। अंदरखाने चर्चाएं हैं कि शहजिल अब अपने पुराने समर्थकों को फिर से साधने और संगठन को मज़बूत करने की कोशिशों में जुट गए हैं। सोशल मीडिया से लेकर ज़मीनी बैठकों तक, दोनों खेमों की सक्रियता साफ तौर पर देखी जा रही है।जहां सुल्तान खुद को जनता की आवाज़ के रूप में पेश कर रहे हैं, वहीं शहजिल अपने पुराने विकास कार्यों और राजनीतिक अनुभव के सहारे जवाबी रणनीति तैयार कर रहे हैं।चुनावी वर्ष न होने के बावजूद भोजीपुरा में जिस तरह से सियासी हलचल तेज़ है, उससे साफ है कि भविष्य की तैयारी अभी से शुरू हो चुकी है। जानकारों का मानना है कि यदि सुल्तान इसी तरह जमीनी मुद्दों पर सक्रिय बने रहे, तो आने वाले समय में शहजिल के लिए राजनीतिक राह आसान नहीं होगी। फिलहाल भोजीपुरा की राजनीति में सुल्तान की एंट्री शहजिल के गढ़ को चुनौती देती नज़र आ रही है।
